आजाद भारत में गांधी: बेलेघाटा से उठता नैतिक प्रश्न
30 जनवरी केवल गांधी की हत्या की तारीख नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा का दिन है। यह संपादकीय बेलेघाटा, कलकत्ता मिरैकल, विभाजन, अहिंसा, तुष्टिकरण और आज के नागरिक समाज के संदर्भ में गांधी को नए दृष्टिकोण से पढ़ने का आग्रह करता है। 30 जनवरी पर एक तीखा संपादकीय बेलेघाटा से आज के भारत तक गांधी की प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श।
आजाद भारत में गांधी: एक असुविधाजनक प्रश्न
30 जनवरी केवल एक तारीख नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की नैतिक स्मृति की तारीख है। यह दिन हमें यह याद दिलाने के लिए नहीं आता कि महात्मा गांधी को कैसे मारा गया, बल्कि यह पूछने आता है कि हम आज किस तरह जीवित हैं? किस तरह का नागरिक जीवन, किस तरह की राजनीति और किस तरह की नैतिक चेतना के साथ। इस प्रश्न को उठाने का स्थान यदि कोलकाता का बेलेघाटा हो, तो उसकी तीक्ष्णता और बढ़ जाती है। बेलेघाटा वह स्थान जहाँ 1947 की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान महात्मा गांधी आकर ठहरे थे। तब का कलकत्ता लाशों, आगजनी और अविश्वास से भरा हुआ था। ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद शहर हिंसा की एक ऐसी आग में जल रहा था जिसमें पड़ोसी पड़ोसी का दुश्मन बन चुका था। और उसी समय एक बूढ़ा, दुर्बल, लगभग निहत्था व्यक्ति बेलेघाटा के एक साधारण से घर में आकर रहने लगा, न सेना के साथ, न पुलिस के पहरे में, न सत्ता के किसी प्रतीक के साथ। उसके पास था तो केवल नैतिक साहस।
गांधी : शरीर नहीं, नैतिक प्रयोग
30 जनवरी 1948 को जिस व्यक्ति को गोली मारी गई, वह केवल एक शरीर नहीं था। वह एक नैतिक प्रयोग था, एक ऐसा प्रयोग जो सत्ता, हिंसा और घृणा के युग में मनुष्य की अंतरात्मा को संबोधित करता था। उस व्यक्ति का नाम महात्मा गांधी था या अधिक ऐतिहासिक सटीकता से कहें, मोहनदास करमचंद गांधी। आजाद भारत में गांधी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि उनसे असहमति है, समस्या यह है कि हमने उन्हें या तो पूजनीय मूर्ति बना दिया या घृणित खलनायक। इन दोनों स्थितियों में गांधी का अध्ययन समाप्त हो जाता है।
‘महात्मा’: गांधी की नहीं, समाज की अपेक्षा
आज यह कहना एक बौद्धिक फैशन बन गया है कि “गांधी महात्मा नहीं थे।” यह बात ऐतिहासिक रूप से सही है। गांधी ने स्वयं कभी यह उपाधि नहीं माँगी। ‘महात्मा’ संबोधन उन्हें रबींद्रनाथ टैगोर ने दिया, और ‘राष्ट्रपिता’ कहे जाने की परंपरा सुभाष चन्द्र बोस के संबोधन से शुरू हुई। लेकिन इस तथ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि महात्मा होना गांधी की महत्वाकांक्षा नहीं थी, यह समाज की नैतिक अपेक्षा थी। और यहीं से समस्या शुरू होती है। जब कोई समाज किसी मनुष्य को अपनी कमजोरियों से ऊपर बैठा देता है, तो वही समाज बाद में उसी मनुष्य को नीचे गिराने में भी असाधारण आनंद अनुभव करता है। आज गांधी को दी जाने वाली गालियाँ इसी मनोवृत्ति की उपज हैं।
आत्मकथा : जहाँ गांधी असुविधाजनक हो जाते हैं
गांधी की आत्मकथा The Story of My Experiments with Truth यानी ‘सत्य के प्रयोग’ को यदि ईमानदारी से पढ़ा जाए, तो वह किसी महापुरुष की कथा नहीं लगती। वह एक नैतिक प्रयोगशाला है जहाँ चोरी है, कामना है, भय है, आत्मसंशय है, धार्मिक भ्रम है, और नैतिक पतन की स्वीकारोक्ति है। इतिहास में कितने नेता हैं जो अपने नैतिक पतन को स्वयं सार्वजनिक करते हैं? यह पाखंड नहीं, यह नैतिक जोखिम है। और शायद यही कारण है कि गांधी हमारे समय के नेताओं को और हमारे समय के नागरिकों को असहज करते हैं।
संत बनाम राजनीतिज्ञ : एक झूठा द्वैत
अकसर पूछा जाता है यदि गांधी संत थे, तो राजनीति में क्यों थे? और यदि राजनीतिज्ञ थे, तो संत जैसा आचरण क्यों? यह प्रश्न भारतीय परंपरा से नहीं, आधुनिक बौद्धिक आलस्य से उपजा है। भारतीय चिंतन में राजनीति और नैतिकता कभी अलग नहीं रहीं। गांधी न संन्यासी थे, न सत्ता-लोलुप राजनीतिज्ञ। वे थे नैतिक हस्तक्षेपकर्ता। 1934 में कांग्रेस से औपचारिक अलगाव के बाद उनके पास न कोई पद था, न कोई संगठन, फिर भी पूरी राजनीति उनकी नैतिक उपस्थिति से असहज रहती थी। यह सत्ता नहीं थी यह चरित्र की शक्ति थी।
बेलेघाटा और ‘कलकत्ता मिरैकल’
बेलेघाटा में गांधी किसी समारोह में नहीं आए थे। वे यहाँ रुकने आए थे, रात-रात भर प्रार्थना करने, गलियों में घूमने, हिंदू-मुस्लिम बस्तियों में निहत्थे जाने के लिए। उन्होंने कहा था “यदि यह हिंसा नहीं रुकी, तो मैं यहीं मर जाऊँगा।” यह कोई नाटकीय वक्तव्य नहीं था। यह अंतिम नैतिक दबाव था। और इतिहास गवाह है कलकत्ता में हिंसा रुकी। बिना गोली, बिना कर्फ्यू, बिना सेना। इसे ही ‘कलकत्ता मिरैकल’ कहा गया। यह घटना अहिंसा की व्यवहारिकता पर सबसे ठोस उत्तर है।
अहिंसा : कायरता नहीं, कठिन साहस
आज कहा जाता है कि गांधी ने हिंदुओं को कायर बना दिया। लेकिन गांधी स्वयं कहते हैं, “एक हिंदू होने के नाते मुझे शर्म आती है कि हिंदू पीछे हट जाता है।” गांधी की अहिंसा डर से उपजी निष्क्रियता नहीं थी। वह हिंसा से अधिक कठिन साहस थी। वे स्पष्ट करते हैं कि देश की रक्षा के प्रश्न पर बल-प्रयोग स्वतः अनैतिक नहीं। उनका विरोध था हिंसा को सिद्धांत बनाने से, न कि आत्मरक्षा से।
क्रांतिकारी बनाम गांधी : इतिहास का सरलीकरण
यह कहना कि गांधी ने भगत सिंह को मरवाया, इतिहास का सरलीकरण है। क्रांतिकारी आंदोलन ने
स्वतंत्रता की चेतना तेज की, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन प्रश्न यह है क्या 1920 के दशक का भारत
सशस्त्र जनक्रांति के लिए सामाजिक रूप से तैयार था? अशिक्षा, भुखमरी, जातिगत विखंडन, और औपनिवेशिक सत्ता में भारतीय सहभागिता इन परिस्थितियों में गांधी का मार्ग नैतिक ही नहीं, रणनीतिक भी था।
45 करोड़ और विभाजन: नैतिकता बनाम भावुकता
पाकिस्तान को 45 करोड़ रुपये देने का प्रश्न आज भी उछाला जाता है। तथ्य यह है कि यह राशि विभाजन समझौते के अनुसार पाकिस्तान का वैध हिस्सा थी। गांधी का अनशन राजनीतिक ब्लैकमेल नहीं था, वह नैतिक संगति का आग्रह था। यह मानना कि राशि न देने से कश्मीर बच जाता, इतिहास के साथ कल्पना का अन्याय है। मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं गांधी से असहज थे। गांधी विभाजन के सूत्रधार नहीं, सबसे बड़े अवरोध थे।
तुष्टिकरण का आरोप और नैतिक आत्मालोचना
गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया जाता है। पर गांधी दोनों समुदायों पर समान रूप से कठोर थे। उन्होंने मुसलमानों को ‘बुली’ और हिंदुओं को ‘कायर’ कहा। यह तुष्टिकरण नहीं, नैतिक आत्मालोचना थी। नोआखली और बेलेघाटा दोनों स्थानों पर वे धर्म के साथ नहीं, पीड़ित के साथ खड़े थे।
आर्थिक गांधी : चेतावनी, योजना नहीं
यह स्वीकार करना होगा कि गांधी का आर्थिक मॉडल चरखा और ग्राम-स्वराज आधुनिक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में अपर्याप्त है। हैंडलूम पावरलूम से नहीं जीत सकता। पर गांधी नीति नहीं लिख रहे थे। वे चेतावनी दे रहे थे कि विकास मनुष्य को कुचलकर न हो।
आजाद भारत : सबसे असुविधाजनक प्रश्न
और अब सबसे कठिन प्रश्न आज हम गांधी को गाली देते हैं। लेकिन हम कौन हैं? हम वह लोग हैं जो अपने माँ-बाप से यह पूछने का साहस नहीं रखते कि आपने देश के लिए क्या किया। हम वह लोग हैं जो गलत के खिलाफ सामूहिक रूप से बोलने की हिम्मत नहीं रखते। हम अपने पार्षद, अपने विधायक, अपने सांसद से उनके भ्रष्टाचार पर सवाल नहीं कर सकते। और फिर हम गाली देते हैं गांधी को उस गांधी को जो गुलाम भारत में अंग्रेजी हुकूमत की आँख में आँख डालकर लड़ रहा था। यह गांधी की विफलता नहीं, यह हमारी नैतिक कायरता है।
गांधी को कैसे पढ़ें?
गांधी को न देवता बनाइए, न राक्षस। उन्हें पढ़िए एक ईमानदार, सीमित, पर असाधारण साहसी मनुष्य की तरह। जो सीखने योग्य है सीखिए। जो अव्यावहारिक है छोड़ दीजिए। पर चरित्र-हत्या बौद्धिक विमर्श नहीं है।
अंतिम बात : बेलेघाटा से आज तक
गांधी की हत्या 1948 में हुई थी। लेकिन उनकी दूसरी हत्या हम हर दिन करते हैं अज्ञान से, घृणा से, और आधी-अधूरी पढ़ाई से। यदि गांधी आज हमारे सामने खड़े होते, तो शायद यही कहते “मुझे मत पूजिए, मुझे समझिए।” यही उनके प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।
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