धारा 8(1)(j) का दुरुपयोग—सूचना के अधिकार पर साया
जब 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम अस्तित्व में आया, तो इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ-नागरिकों-के हाथ में एक निर्णायक शक्ति माना गया। इसने शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही को नई परिभाषा दी। लेकिन आज, जब हम अधिनियम की 20वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहे हैं, तो इसके एक महत्वपूर्ण प्रावधान-धारा 8(1)(j)-का दुरुपयोग इसे खोखला कर रहा है।

सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 को भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ कहा जा सकता है। इसने नागरिकों को शासन के हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक सशक्त औजार दिया। लेकिन विडंबना यह है कि यही कानून, जिसे सशक्तिकरण का प्रतीक होना था, अब कई बार धारा 8(1)(j) के दुरुपयोग की भेंट चढ़ता दिख रहा है।
धारा 8(1)(j) का स्वरूप: उद्देश्य बनाम व्यवहार
धारा 8(1)(j) कहती है कि कोई भी व्यक्तिगत जानकारी, जिसका सार्वजनिक गतिविधियों से कोई संबंध नहीं है या जिससे व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होता है, उसे आरटीआई के तहत देने से छूट दी जा सकती है-जब तक कि यह 'बड़े सार्वजनिक हित' में न हो।
इसका उद्देश्य स्पष्ट था-निजता की रक्षा। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई लोक सूचना अधिकारी (PIO) और सरकारी विभाग इस धारा का सहारा लेकर उन सूचनाओं को भी छुपाते हैं, जिनका सीधा संबंध सार्वजनिक हित से होता है।
न्यायिक नजीरें: जब न्यायपालिका ने दी चेतावनी
केन्द्रीय सूचना आयोग बनाम राज्यसभा सचिवालय (2023)
इस हालिया मामले में आयोग ने स्पष्ट कहा कि ‘‘सिर्फ धारा 8(1)(j) का हवाला देकर सूचना देने से मना करना पर्याप्त नहीं है। यह बताना जरूरी है कि संबंधित जानकारी किस प्रकार ‘निजी’ है और उसका सार्वजनिक हित से क्या विरोध है।’’
गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम CIC (2013, सुप्रीम कोर्ट)
इस निर्णय में कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा विवरण, एसीआर, अनुशासनात्मक कार्रवाई आदि जैसी जानकारियां व्यक्तिगत हो सकती हैं। लेकिन इसी निर्णय का अंधानुकरण करते हुए कई मामलों में सामान्य प्रशासनिक जानकारी भी रोक दी गई। CIC ने बाद के मामलों में स्पष्ट किया कि यह निर्णय तथ्य-आधारित था, न कि सार्वभौमिक सिद्धांत।
राजा राम बनाम पंजाब नेशनल बैंक (CIC निर्णय, 2016)
इस निर्णय में आयोग ने PIO पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया क्योंकि उन्होंने बार-बार धारा 8(1)(j) का गलत हवाला देकर बुनियादी सेवा जानकारी नहीं दी। आयोग ने इसे “कानूनी प्रावधानों का दुर्भावनापूर्ण दुरुपयोग” कहा।
दुरुपयोग के सामाजिक-प्रशासनिक प्रभाव
जब नागरिक किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा से संबंधित जानकारी-जैसे स्थानांतरण, वेतन, अनुशासनात्मक कार्यवाही-माँगते हैं, तो यह अक्सर जनहित से जुड़ी होती है। लेकिन विभाग इन्हें निजी बताकर रोकते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि:
भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ता है,
जवाबदेही धूमिल होती है,
और नागरिकों का विश्वास RTI प्रणाली पर कमजोर होता है।
सुधार की आवश्यकता
RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) को निजता की रक्षा और पारदर्शिता के बीच संतुलन साधने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज जरूरत है कि-
PIOs को इस धारा की व्याख्या और सीमाओं की उचित ट्रेनिंग दी जाए,
CIC और न्यायालयों के स्पष्ट दिशानिर्देशों को अनदेखा करने पर दंड सुनिश्चित किया जाए,
और सबसे जरूरी, नागरिकों को कानूनी उपचारों का ज्ञान हो ताकि वे अपील व पुनः अपील के माध्यम से अपनी सूचना का अधिकार पा सकें।
RTI अधिनियम को उसकी मूल भावना में जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि धारा 8(1)(j) को ढाल नहीं, न्याय का साधन बनाया जाए।
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